माेहान (अल्मोड़ा ) स्थित देश की इकलौती केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र की आयुर्वेदिक एवं यूनानी दवा निर्माता कंपनी इंडियन मेडिसिन फार्मास्युटिकल कार्पोरेशन लिमिटेड (आइएमपीसीएल) पर सरकार का स्वामित्व अब पूरी खत्म हो गया है। दिल्ली की निजी दवा कंपनी स्काईमैप फार्मास्युटिकल्स ने इसके लिए ₹121,00,94,400 की सबसे ऊंची बोली लगाई, जिसे सरकार के सक्षम मंत्रियों के समूह ने मंजूरी दी और बीती रात केंद्र सरकार के रणनीतिक विनिवेश के तहत निजीकरण की सभी औपचारिकताएं पूर्ण कर लेने के बाद लगातार मुनाफे वाली आइएमपीसीएल निजी क्षेत्र की दवा कंपनी स्काइमैप को हस्तांतरित कर दी गई।हस्तांतरण प्रक्रिया पूरी होते ही कंपनी के सरकारी निदेशकों को वापस आयुष मंत्रालय भेज दिया गया है। सोमवार से नया बोर्ड नीतिगत दिशा-निर्देश जारी कर कमान संभालेगा।
उल्लेखनीय हैं आईएमपीसीएल आयुष मंत्रालय के अधीन पारंपरिक औषधि निर्माण की रीढ़ की हड्डी के रूप में काम कर रही थी और एक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम के रूप में , सीजीएचएस और ईएसआई अस्पतालों को आयुर्वेदिक और यूनानी दवाओं की आपूर्ति पर इसका लगभग एकाधिकार था।इस सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम की विनिर्माण सुविधा देश की उन गिनी-चुनी सुविधाओं में से एक है जो मानकीकृत पारंपरिक औषधियों की एक विशाल श्रृंखला का उत्पादन करने में सक्षम है।यह सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम लाभ कमाने वाली इकाई थी जिसका कारोबार बढ़ रहा था, जिससे यह निजी निवेशकों के लिए एक बेहद आकर्षक “रणनीतिक बिक्री” लक्ष्य बन गया था।
हस्तांतरण को लेकर स्थानीय चिंताएं और विरोध :
इस फैक्टरी में लगभग 500 कर्मचारी कार्यरत हैं, जिनमें से अधिकांश पहाड़ (उत्तराखंड) के स्थानीय निवासी हैं। निजीकरण के बाद कर्मचारियों और स्थानीय लोगों में भविष्य को लेकर रोष और चिंताएं हैं। आईएमपीसीएल कर्मचारी संघ’ का कहना है कि इस फैसले से सैकड़ों ग्रामीण परिवारों की रोजी-रोटी संकट में पड़ गई है।
स्थानीय स्तर और कुछ राजनीतिक संगठनों द्वारा विरोध जताया जा रहा है कि लगभग ₹145 करोड़ से अधिक की नेटवर्थ वाली मुनाफे में चल रही इस सरकारी धरोहर को सिर्फ ₹121 करोड़ में निजी हाथों में सौंप दिया गया।स्थानीय नेताओं का आरोप है कि कंपनी के पास ₹50 करोड़ की एफडी (फिक्स्ड डिपॉजिट) और ₹40 करोड़ का लंबित जीएसटी रिफंड भी शेष है, जिसे देखते हुए यह सौदा को बेहद कम कीमत पर किया गया है.
मोहान और रामनगर क्षेत्र के आसपास के 30 से अधिक छोटे-बड़े उद्योग इस फैक्ट्री से जुड़े हुए हैं जो इसे जड़ी-बूटियां, पैकेजिंग सामग्री, नींबू, आंवला और हल्दी जैसी कच्ची सामग्री की आपूर्ति करते हैं।किसानों और स्थानीय ग्रामीणों को डर है कि निजी कंपनी कच्चे माल के लिए स्थानीय स्रोतों के बजाय बाहरी और सस्ते विकल्प तलाश सकती है, जिससे इस पर्वतीय क्षेत्र की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पूरी तरह प्रभावित होगी
सरकार का मानना है कि इस रणनीतिक बिक्री के माध्यम से आईएमपीसीएल के इंफ्रास्ट्रक्चर और आधुनिकीकरण में तेजी आएगी, रिसर्च एंड डेवलपमेंट बढ़ेगा और आयुष दवाओं को वैश्विक फार्मास्युटिकल मानकों के अनुरूप लाने में मदद मिलेगी।
निजीकरण के विरोध में आईएमपीसीएल के कर्मचारी और स्थानीय लोग अनिश्तिकालीन धरने और प्रदर्शन पर बैठ गए हैं। इस आंदोलन को ‘उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी’ और ‘इंकलाबी मजदूर केंद्र’ जैसे संगठनों का भी समर्थन मिल रहा है, जो सरकार से इस रणनीतिक हस्तांतरण को तुरंत निरस्त करने की मांग कर रहे हैं।
