उत्तराखंड सरकार ने छात्रसंघ चुनाव में छात्राओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण का शासनादेश जारी कर दिया है। उच्च शिक्षा सचिव की ओर से जारी आदेश के बाद राज्य के राजकीय महाविद्यालयों और विश्वविद्यालय परिसरों में होने वाले छात्रसंघ चुनाव अब इसी व्यवस्था के आधार पर कराए जाएंगे।उत्तराखंड देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है जहाँ छात्रसंघ चुनावों में छात्राओं को 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व दिया गया है। यह नियम प्रदेश के 118 राजकीय महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के परिसरों में लागू किया गया है।
सरकार का यह फैसला ऐसे समय आया है जब 29 सितंबर को तीन राज्य विश्वविद्यालयों और राजकीय महाविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव प्रस्तावित हैं। यानी घोषणा से लेकर शासनादेश और चुनाव की तैयारियों के बीच समय काफी कम है।
फैसले को लेकर छात्राओं के बीच सकारात्मक प्रतिक्रिया सामने आई है। 2024 में इसी व्यवस्था की घोषणा के बाद छात्राओं ने इसे नेतृत्व और निर्णय प्रक्रिया में अपनी भागीदारी बढ़ाने वाला कदम बताया था। राज्य के उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्राओं की संख्या भी पुरुष छात्रों से अधिक है—उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार करीब 65.8 प्रतिशत विद्यार्थी छात्राएं हैं।
लेकिन छात्र राजनीति में सवाल भी
शासनादेश जारी होने के बाद सबसे बड़ा सवाल आरक्षण के व्यावहारिक स्वरूप को लेकर है। 50 प्रतिशत आरक्षण किन पदों पर और किस चुनावी फार्मूले के तहत लागू होगा, इसका प्रभाव अलग-अलग विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में छात्रसंघ संरचना पर पड़ सकता है।
दूसरा सवाल चुनाव कार्यक्रम को लेकर है। चुनाव की तारीख नजदीक होने के कारण विश्वविद्यालयों को अपने मौजूदा छात्रसंघ नियमों और प्रतिनिधित्व व्यवस्था में बदलाव करना होगा। सरकार ने पहले ही कुलपतियों को मौजूदा ढांचे में संशोधन के निर्देश दिए थे।
फिलहाल 14 सहायता प्राप्त अशासकीय महाविद्यालयों को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। इन कॉलेजों में चुनाव कराने का अधिकार संबद्ध विश्वविद्यालय के पास है। उच्च शिक्षा विभाग के अनुसार इन संस्थानों में चुनाव की तारीख और प्रक्रिया संबंधित विश्वविद्यालय को तय करनी है।यही व्यवस्था इस फैसले को प्रशासनिक रूप से भी महत्वपूर्ण बनाती है—क्योंकि राज्य के राजकीय संस्थानों में शासनादेश सीधे लागू होगा, जबकि संबद्ध अशासकीय संस्थानों में विश्वविद्यालयों की भूमिका निर्णायक होगी।
छात्र राजनीति का बदलता चेहरा
• इस फैसले का असर केवल चुनावी गणित तक सीमित नहीं माना जा सकता। उत्तराखंड के कॉलेज परिसरों में छात्रसंघ चुनाव लंबे समय से राजनीतिक नेतृत्व तैयार करने का महत्वपूर्ण माध्यम रहे हैं। 2026 के चुनावों की घोषणा के साथ ही परिसरों में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो चुकी हैं।
• 50 प्रतिशत महिला आरक्षण से अब छात्र राजनीति में महिला नेतृत्व की संख्या बढ़ने की संभावना है। हालांकि इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि छात्राएं कितनी संख्या में चुनाव लड़ती हैं, चुनावी प्रतिस्पर्धा कैसी रहती है और निर्वाचित प्रतिनिधि कैंपस के मुद्दों को किस तरह आगे बढ़ाते हैं।
• सरकार का निर्णय छात्रसंघों में महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा संस्थागत बदलाव है। लेकिन इसकी सफलता का आकलन केवल आरक्षण लागू होने से नहीं, बल्कि महिला उम्मीदवारों की वास्तविक भागीदारी, निर्वाचित प्रतिनिधियों की प्रभावी भूमिका और चुनाव प्रक्रिया के पारदर्शी क्रियान्वयन से होगा।
29 सितंबर के छात्रसंघ चुनाव इसलिए उत्तराखंड की छात्र राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षण बन गए हैं—क्या 50 प्रतिशत आरक्षण कैंपस नेतृत्व की तस्वीर बदलता है, या यह केवल चुनावी व्यवस्था में एक नया प्रावधान बनकर रह जाता है ?
