उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य आंदोलनकारियों के 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण के तहत उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के माध्यम से 751 विभिन्न सरकारी पदों को भरने के लिए चल रही भर्ती प्रक्रिया में राज्य आंदोलनकारियों के वंशजों को नियुक्ति पत्र जारी करने पर रोक लगा दी और आयोग को छह सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब पेश करने का निर्देश दिया।
हरिद्वार निवासी सक्षम चौहान द्वारा दायर याचिका पर जस्टिस पंकज पुरोहित की सिंगल जज बेंच ने सुनवाई करते हुए उक्त निर्देश जारी किए। याचिका में राज्य सरकार के 1 जुलाई 2026 के उस शासनादेश को चुनौती दी गई है, जिसके तहत उन अभ्यर्थियों को भी दस्तावेज सत्यापन में शामिल होने की अनुमति दी गई, जिन्होंने आवेदन के वक्त आंदोलनकारी प्रमाणपत्र नहीं लगाया था। याचिका में पात्रता शर्तों को बीच में बदलने पर आपत्ति व्यक्त करते हुए ज प्रकाश पाठक एवं अन्य बनाम राजस्थान हाईकोर्ट एवं अन्य मामले पर उच्चतम न्यायालय के निर्णय को नजीर के रूप में प्रस्तुत किया गया ।
न्यायालय द्वारा पूरे मामले की वैधानिकता और औचित्य पर लगातार सुनवाई कर राज्य आंदोलनकारियों के वंशजों को नियुक्ति पत्र जारी करने पर लगाई गई 15 जुलाई की रोक को अगली सुनवाई तक बढ़ाते हुए निजी प्रतिवादियों को नियुक्ति पत्र जारी करने पर लगाई गई रोक को भी बरकरार रखा है। याचिका पर अगली सुनवाई 16 सितंबर 2026 को निर्धारित हैँ ।
उल्लेखनीय हैं कि उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों को 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण की व्यवस्था को लेकर पूर्व से आपत्ति रही हैं। अगस्त 2024 में राज्य आंदोलनकारियों को 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण देने हेतु बनाये गए कानून के खिलाफ देहरादून निवासी भुवन सिंह तथा अन्य द्वारा उच्च न्यायालय में जनहित याचिका के माध्यम से असंवैधानिक करार दिए जाने की मांग की गई थी ।
राज्य आंदोलनकारियों के आरक्षण के तहत वंशजों को नियुक्ति पत्र जारी करने पर रोक लगाए जाने सम्बन्धी आदेश पर राज्य आंदोलनकारी संगठनों की प्रतिक्रियाएँ परिलक्षित हैं। आंदोलनकारी और उनके पैरोकार इस मामले में अदालत के समक्ष मजबूती से अपना पक्ष रखने और सरकार से प्रभावी पैरवी करने की मांग कर रहे हैं।
