नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया ने 2,000 रुपए से ज़्यादा के यूपीआई भुगतान पर 0.4% शुल्क लागू किया है.ऐसे में सवाल उठ रहा है कि सरकार जब डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा दे रही है और कैश के इस्तेमाल को कम करना चाह रही है फिर एमडीआर लाने का फ़ैसला क्यों लिया गया ?
वित्त मंत्रालय का मत है कि नए एमडीआर ढांचे से यूपीआई को आत्मनिर्भर बनाने में मदद मिलेगी, ग्रामीण और सेमी अर्बन इलाक़ों में इसके और विस्तार के लिए प्रोत्साहन मिलेगा और इसकी प्रतिस्पर्धात्मकता बनी रहेगी.
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि यह क़दम सरकार के अमेरिकी दबाव के आगे झुकने का नतीजा है. वित्त मंत्रालय ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा है कि UPI नीति भारत की अपनी डिजिटल-पेमेंट जरूरतों और ecosystem की sustainability के आधार पर बनाई गई है।
इस मामले में विपक्ष अमेरिकी दबाव क्यों देख रहा है?
MDR लगाने की मांग अमेरिका के दबाव से पहले भी भारत के भीतर मौजूद थी। अप्रैल 2025 में Reuters ने रिपोर्ट किया था कि RBI, payment-industry और भारतीय अधिकारी बड़े merchants के UPI भुगतानों पर MDR की वकालत कर रहे थे, ताकि payment ecosystem की लागत और निवेश को टिकाऊ बनाया जा सके।
इसी साल मार्च में यूनाइटेड स्टेट ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (यूएसटीआर) ने घरेलू कंपनियों को फ़ायदा पहुँचाने वाली भारत की डिजिटल भुगतान नीतियों को विदेशी कारोबार में बाधा के रूप में चिह्नित किया था.यूएसटीआर ने कहा था कि उसने अमेरिकी इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट सर्विसेज सप्लायर्स के यूपीआई इकोसिस्टम में शामिल होने में असमर्थता को लेकर चिंता जताई है.
भारत अकेला ऐसा देश नहीं है, जिसके पेमेंट सिस्टम पर अमेरिका की नज़र है. जुलाई 2025 में ब्राज़ील की इंस्टेंट पेमेंट सिस्टम पिक्स अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निशाने पर आ गया था.
यूपीआई भुगतान पर शुल्क लागू करने के निर्णय पर Financial Times ने रिपोर्ट किया हैं कि अमेरिका की एक रिपोर्ट ने भारत के zero-charge UPI मॉडल को trade barrier के रूप में देखा था और उसी व्यापक दौर में UPI शुल्क की नीति बदली।
