
चंपावत जिले के देवीधुरा में स्थित मां वाराही देवी मंदिर में हर साल रक्षाबंधन के अवसर पर ऐतिहासिक बग्वाल (पाषाण युद्ध/पत्थरों व फलों की लड़ाई) खेली जाती है। हर साल रक्षाबंधन के पर्व पर (आषाढ़ी कौतिक मेला)के दिन मनाया जाने वाला एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक लोक पर्व है।
इस मेले का मुख्य आकर्षण बग्वाल यानी पत्थरों का युद्ध है, जिसमें चार खामों (वालिक, लमगढ़िया, चमियाल और गहड़वाल) के लोग दो समूहों में बंटकर एक-दूसरे पर फल-फूल या पारंपरिक रूप से पत्थर फेंकते हैं। हालांकि, अब सुरक्षा और परंपरा को ध्यान में रखते हुए इसे फलों (जैसे नाशपाती) और फूलों से भी खेला जाने लगा है।यह बग्वाल च्यम्याल, गहमड़वाल, लमगड़िया और वालिक (चार खामों) के लोगों के बीच खेली जाती है। पुजारी के शंखनाद के साथ यह युद्ध शुरू होता है।
मान्यता है कि पहले यहां नरबलि की प्रथा थी। एक बुजुर्ग महिला के बेटे की बलि की बारी आने पर उसने मां से गुहार लगाई। तब देवी मां ने प्रकट होकर निर्देश दिया कि नरबलि के बजाय एक मनुष्य के बराबर रक्त बहना चाहिए। इसके बाद से पत्थरों और फलों से यह अनूठा युद्ध खेलने की परंपरा शुरू हुई।
यह मेला पारंपरिक रूप से कई दिनों (जैसे 13 दिवसीय) तक चलता है, जिसमें कुमाऊं की समृद्ध लोक संस्कृति, छलिया नृत्य और धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं।यह स्थान चंपावत जिले के लोहाघाट से लगभग 45 किलोमीटर दूर स्थित है, जहाँ देश-विदेश से भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
