उत्तराखंड की सरकारी भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता और व्यवस्था पर सवाल खड़े करने वाला 2016 का ग्राम पंचायत विकास अधिकारी भर्ती प्रकरण एक बार फिर सुर्खियों में है। करीब एक दशक पुराने मामले में प्रवर्तन निदेशालय की हालिया कार्रवाई ने इस प्रकरण को महज भर्ती परीक्षा में कथित अनियमितता के बजाय कथित आर्थिक लेन-देन और अवैध लाभ की जांच के बड़े दायरे में ला दिया है।
2016 में शुरू हुई थी कहानी
उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग की ओर से वर्ष 2016 में ग्राम पंचायत विकास अधिकारी के पदों के लिए परीक्षा आयोजित की गई थी। परीक्षा के बाद परिणाम और चयन प्रक्रिया को लेकर सवाल उठे और जांच आगे बढ़ी।मामले का सबसे गंभीर पहलू OMR उत्तर पुस्तिकाओं में कथित छेड़छाड़ का सामने आना था। जांच एजेंसियों के अनुसार कुछ OMR शीटों को आयोग की सुरक्षित अभिरक्षा से बाहर ले जाकर निजी कंप्यूटर एजेंसी के माध्यम से कथित तौर पर बदला गया और फिर उन्हें दोबारा सीलबंद किया गया। ED के अनुसार इस प्रक्रिया में बिचौलियों के माध्यम से अवैध भुगतान किए जाने की आशंका की जांच की जा रही है।यानी सवाल केवल यह नहीं था कि परीक्षा में किसने अनुचित लाभ हासिल किया, बल्कि यह भी था कि OMR जैसी महत्वपूर्ण परीक्षा सामग्री तक पहुंच कैसे बनी और इसके पीछे पूरा नेटवर्क कौन संचालित कर रहा था ?
दस साल बाद ED की एंट्री
10 सितंबर को ED ने इस मामले से जुड़े कई ठिकानों पर तलाशी अभियान चलाया। इनमें पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के पूर्व OSD और वर्तमान निजी सहायक चंदन सिंह जीना का आवास भी शामिल था। ED के मुताबिक तलाशी के दौरान लगभग ₹32 लाख नकद, करीब 200.5 ग्राम सोना और 12 लग्जरी घड़ियां बरामद की गईं तथा लगभग ₹1.28 करोड़ की संपत्तियों को जब्त/फ्रीज किए जाने की बात कही गई है। यहीं से पुराना भर्ती प्रकरण एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है।
हरीश रावत का इस्तीफा और राजनीतिक तूफान
ED की कार्रवाई के बाद पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी की कार्यकारिणी और कांग्रेस कार्यसमिति के स्थायी आमंत्रित सदस्य के पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने चंदन जीना को अपना पुराना सहयोगी बताते हुए उनके खिलाफ लगे आरोपों पर अविश्वास जताया, लेकिन साथ ही कहा कि यदि भर्ती परीक्षा में OMR से छेड़छाड़ में उनकी भूमिका सिद्ध होती है तो यह उनके लिए शर्मनाक होगा। रावत ने कार्रवाई के राजनीतिक उद्देश्य पर भी सवाल उठाए हैं, जबकि भाजपा की ओर से इसे कांग्रेस सरकार के दौर के भर्ती तंत्र से जोड़कर निशाना साधा जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल—घोटाला कितना बड़ा था?
परीक्षा प्रक्रिया: OMR शीट जैसी संवेदनशील सामग्री सुरक्षित अभिरक्षा से बाहर कैसे पहुंची?
आर्थिक नेटवर्क: यदि अभ्यर्थियों को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए पैसे का लेन-देन हुआ, तो पैसा किससे लिया गया और किन लोगों तक पहुंचा?
प्रभावशाली लोगों की भूमिका:क्या यह केवल कुछ कर्मचारियों, बिचौलियों और अभ्यर्थियों तक सीमित था या इसके तार राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर तक जुड़े थे?
राजनीतिक सवाल भी उतने ही गंभीर
विधानसभा चुनाव से पहले इस मामले का फिर उभरना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक महत्व रखता है। कांग्रेस इसे राजनीतिक कार्रवाई के रूप में देख सकती है, जबकि भाजपा इसे पूर्ववर्ती शासनकाल में भर्ती व्यवस्था की कथित खामियों का प्रमाण बताकर चुनावी मुद्दा बना सकती है।लेकिन राजनीति से अलग कानूनी और प्रशासनिक सवाल अपनी जगह कायम हैं।
ईडी ने पीएमएलए के तहत केस दर्ज कर जांच की गति तेज कर दी है, लेकिन जब तक इस भ्रष्टाचार की जड़ तक नहीं पहुंचा जाता, तब तक एक दशक पुराने इस वीपीडीओ घोटाले के ये बुनियादी सवाल अनुत्तरित ही रहेंगे। प्रकरण की जांच तय करेगा कि दस साल पुरानी यह कहानी केवल एक और भर्ती घोटाले की फाइल बनकर रह जाएगी या उत्तराखंड की भर्ती व्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण मामलों में से एक का सच सामने आएगा।
