कर्मियों का आरोप है कि इस अनुबंध में यह शर्त शामिल की गई है कि वे भविष्य में कभी भी नियमितीकरण की मांग नहीं करेंगे. इसके अलावा अनुबंध में मेडिकल सुविधा, बोनस, सामाजिक सुरक्षा और अन्य जरूरी लाभों का भी स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है. ऐसे में कर्मचारियों को आशंका है कि वे लंबे समय तक अस्थायी स्थिति में ही काम करने को मजबूर रहेंगे.
वर्ष २०१८ में नैनीताल उच्च न्यायालय ने उपनल कर्मचारियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार को निर्देश दिया था कि कर्मचारियों के नियमितीकरण की प्रक्रिया तैयार की जाए और तब तक उन्हें समान कार्य के बदले समान वेतन दिया जाए. राज्य सरकार ने इस आदेश के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील की ।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सरकार की याचिका खारिज होने के बाद सरकार के लिए कर्मचारियों के हित में निर्णय लेना अनिवार्य हो गया.कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल की अध्यक्षता में एक मंत्रिमंडलीय समिति का गठन किया गया, जिसकी सिफारिशों के आधार पर समान कार्य के बदले समान वेतन का निर्णय लिया गया.हालांकि अदालत ने स्पष्ट रूप से नियमितीकरण के निर्देश भी दिए थे, लेकिन सरकार ने फिलहाल केवल समान वेतन लागू करने का निर्णय लिया. इसके बावजूद कर्मचारी इस फैसले से संतुष्ट नजर आए थे. लेकिन अब अनुबंध की शर्तों ने पूरे मामले को फिर से विवादों में ला खड़ा किया है.
