भारतीय ज्ञान परम्परा की ऐतिहासिक भूमि बद्रिकाश्रम धाम में 13 से 15 मई तक “भारतीय ज्ञान परम्परा की ऐतिहासिक भूमि बद्रिकाश्रम धाम” विषय पर एक तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया जा रहा है। उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय हरिद्वार, सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय अल्मोड़ा, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय रघुनाथ कीर्ति परिसर देवप्रयाग तथा अग्निमन्दिर के संयुक्त तत्त्वावधान में आयोजित सेमिनार का शुभारम्भ नारायण स्वामी आश्रम बद्रीनाथ मेंप्रोफेसर रमाकान्त पाण्डेय- कुलपति उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय हरिद्वार की अध्यक्षता हुआ।
सम्मेलन में 350 से अधिक प्रतिभागी भाग ले रहे हैं। शुभारम्भ कार्यक्रम के मुख्य अतिथि स्वामी बालकनाथ जी महाराज द्वारा अपने उदबोधन में कहा कि कहा कि बद्रिकाश्रम धाम केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सनातन भारतीय ज्ञान परम्परा का जीवंत केंद्र है। यह पुण्यभूमि सदियों से ऋषियों, योगियों एवं तपस्वियों की साधना का केंद्र रही है, जहाँ से वेद, उपनिषद, योग एवं अध्यात्म की दिव्य चेतना संपूर्ण विश्व में प्रवाहित हुई।बद्रीनाथ धाम का प्रत्येक कण भारतीय संस्कृति, तप, त्याग एवं आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत है। यह वही भूमि है जहाँ नर-नारायण ने तप किया, जहाँ वेदव्यास ने महाभारत की रचना की तथा जहाँ आदिगुरु शंकराचार्य ने सनातन धर्म की पुनर्स्थापना का महान कार्य किया।
प्रोफेसर रमाकान्त पाण्डेय द्वारा उल्लेख करते हुए कहा कि हिमालय की गोद में स्थित यह धाम सदियों से आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र माना जाता है,बद्रीनाथ धाम से जुड़ी अनेक पौराणिक एवं आध्यात्मिक मान्यताओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यहाँ आज भी ऋषि परम्परा की सूक्ष्म चेतना विद्यमान है।
प्रोफेसर पी वी सुब्रह्मण्यम -निदेशक केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय देवप्रयाग परिसर ने बद्रीनाथ धाम की अलौकिक महिमा एवं रहस्यमयी परम्पराओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बद्रिकाश्रम धाम केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि वैश्विक आध्यात्मिक सभ्यता एवं ज्ञान-विज्ञान का प्राचीन स्रोत रहा है।
उद्घाटन सत्र में भारतीय शिक्षा पद्धति, गुरुकुल परम्परा, योग-विज्ञान, पर्यावरण चेतना एवं सनातन जीवन मूल्यों पर भी गंभीर चर्चा हुई।आयोजन का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा, प्राचीन भारतीय दर्शन, और हिमालयी संस्कृति के संदर्भ में बद्रीनाथ के महत्त्व पर चर्चा करना है।
सेमिनार के प्रमुख विषय वेद-वेदांत परंपरा और नर-नारायण आश्रम,श्री बदरी विशाल का ऐतिहासिक, भौगोलिक और हिमालयी संदर्भ,महर्षि वेद व्यास, महाभारत, पुराण और भारतीय ज्ञान परंपरा,आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य और बदरिकाश्रम और वैष्णव भक्ति परंपरा और बद्री क्षेत्र है।
