स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत अमर शहीद टिहरी जनक्रांति के नायक श्रीदेव सुमन का बलिदान दिवस प्रतिवर्ष 25 जुलाई को मनाया जाता है। टिहरी रियासत की राजशाही के खिलाफ ऐतिहासिक भूख हड़ताल के बाद, 25 जुलाई 1944 को जेल में ही उनका निधन हो गया था।श्रीदेव सुमन का बलिदान भारतीय इतिहास में अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण और उल्लेख योग्य है।महान क्रांतिकारी यतीन्द्रनाथ या जतिन दास ने बोर्स्टल जेल में 63 दिन की भूख हड़ताल के बाद देश की आजादी के लिए प्राणोत्सर्ग किया था। उनके बाद श्रीदेव सुमन ने जतिन दास द्वारा स्थापित परम्परा को आगे बढ़ा कर टिहरी की जेल में 84 दिनों की भूख हड़ताल के बाद प्राण त्यागे थे।हालांकि श्रीदेव सुमन का संघर्ष टिहरी की राजशाही के जुल्मों के खिलाफ था मगर वह एक समर्पित कांग्रेसी भी थे और राष्ट्रीय आन्दोलन में भी उतने ही सक्रिय थे। उनके बलिदान का स्वाधीनता आन्दोलन पर व्यापक असर पड़ा। सुन्दरलाल बहुगुणा के प्रेरणास्रोत भी श्रीदेव सुमन ही रहे।
श्रीदेव सुमन, जिनका बचपन का नाम श्रीदत्त बडोनी था,कांग्रेस की देशी राज्य लोक परिषद में सक्रिय थे और अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद के अधिवेशनों में भाग लेते थे, 20 मार्च 1938 को दिल्ली में हुए अखिल भारतीय पर्वतीय सम्मेलन में बदरीदत्त पाण्डे के साथ श्रीदेव सुमन ने भी भाग लिया।
अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद की बैठक में भाग लेकर 18 अगस्त 1942 को देहरादून लौटे और 29 अगस्त 1942 को जब वह देवप्रयाग से कोटी होते हुये टेहरी जा रहे थे तो उन्हें ’भारत छोड़ो आन्दोलन’ के सिलसिले में बंदी बना कर मुनि की रेती पहुंचाया गया।वहां से देहरादून में ब्रिटिश पुलिस के हवाले किए गए। पुलिस ने उन्हें आगरा जेल भेज दिया। आगरा जेल से छूटे तो फिर टिहरी पुलिस ने पकड़ कर जेल डाल दिया। जहां से वह कभी जीवित नहीं निकल पाए।
