उत्तराखंड में वर्षों से जमीन पर पट्टे अथवा कब्जे के आधार पर रह रहे लोगों के लिए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में बनबसा में हुई कैबिनेट बैठक महत्वपूर्ण फैसला लेकर आई है। सरकार ने वर्ग-3 और वर्ग-4 की भूमि के पात्र पट्टेदारों एवं कब्जाधारकों को भूमिधरी अधिकार देने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने को मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही नैनीताल जिले के लालकुआं नगर पंचायत क्षेत्र में संबंधित लोगों को संक्रमणीय भूमिधर अधिकार और देहरादून के परगना जौनसार-बावर में वर्ग-4 की भूमि के विनियमितीकरण की अवधि बढ़ाने का निर्णय लिया गया है।
चार साल से अटकी थी प्रक्रिया
भूमिधरी अधिकार देने की प्रक्रिया पहले 2016 से 2022 के बीच चली थी, लेकिन इसके बाद प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। अब कैबिनेट के फैसले से इसे दोबारा लागू करने का रास्ता साफ हुआ है। राजस्व विभाग के अनुसार, इसका लाभ प्रदेश में बड़ी संख्या में पात्र पट्टेदारों और कब्जाधारकों को मिल सकता है। इस फैसले का सबसे प्रत्यक्ष असर उन परिवारों पर पड़ेगा जिनका जमीन से वर्षों पुराना संबंध तो है, लेकिन उनके पास पूर्ण भूमिधरी अधिकार नहीं हैं। भूमिधरी अधिकार मिलने के बाद उनकी भूमि संबंधी स्थिति अधिक स्पष्ट और कानूनी रूप से मजबूत हो सकेगी।
क्या है वर्ग-3 और वर्ग-4 की जमीन ?
राजस्व व्यवस्था में वर्ग-3 यानी असामी पट्टाधारक के तहत ऐसी भूमि आती है, जिस पर बंदोबस्ती से पहले से कब्जा रहा है और खतौनियों में संबंधित लोगों के नाम दर्ज हैं। वहीं वर्ग-4 में मुख्य रूप से सीलिंग की ऐसी भूमि शामिल है, जिसका पट्टा लोगों को दिया गया था।ऐसी भूमि पर रहने वाले परिवारों के लिए सबसे बड़ी समस्या यह रही है कि लंबे समय तक कब्जा या पट्टा होने के बावजूद उनके अधिकार सामान्य भूमिधर की तरह स्पष्ट नहीं थे। कैबिनेट के फैसले से पात्र मामलों में इस स्थिति को नियमित करने का रास्ता खुला है।
लालकुआं-बिंदुखत्ता को विशेष राहत
नैनीताल जिले का लालकुआं नगर पंचायत क्षेत्र इस फैसले के प्रमुख लाभार्थी क्षेत्रों में है। कैबिनेट ने यहां संबंधित पट्टेदारों और कब्जाधारकों को संक्रमणीय भूमिधर अधिकार देने को मंजूरी दी है। लालकुआं-बिंदुखत्ता क्षेत्र में भूमि अधिकार लंबे समय से स्थानीय स्तर पर महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है। इसलिए सरकार का यह फैसला केवल राजस्व प्रक्रिया से जुड़ा प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की भूमि संबंधी स्थिति को प्रभावित करने वाला कदम माना जा रहा है।
जौनसार-बावर में भी खुलेगा रास्ता
देहरादून जिले के परगना जौनसार-बावर में वर्ग-4 की भूमि के विनियमितीकरण की अवधि को भी एक वर्ष के लिए बढ़ाने की मंजूरी दी गई है। इससे ऐसे पात्र परिवारों को निर्धारित प्रक्रिया पूरी करने का अतिरिक्त अवसर मिलेगा।
2004 के सर्किल रेट का मिलेगा आधार
फैसले का सबसे महत्वपूर्ण वित्तीय पहलू 2004 के सर्किल रेट से जुड़ा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार संबंधित भूमि के विनियमितीकरण के लिए एक वर्ष तक 2004 के सर्किल रेट को आधार बनाया जाएगा। इसके बाद वर्तमान प्रचलित सर्किल रेट के अनुसार राशि निर्धारित होगी। इसका सीधा अर्थ यह है कि पात्र लाभार्थियों के पास प्रक्रिया पूरी करने के लिए सीमित अवधि में आवेदन और निर्धारित भुगतान करने का अवसर होगा। देरी होने पर वर्तमान सर्किल रेट लागू होने से वित्तीय भार बढ़ सकता है।
नियमावली में भी संशोधन
कैबिनेट ने उत्तराखंड (उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था नियमावली, 1952) में संशोधन को भी मंजूरी दी है। सरकार के अनुसार इसका उद्देश्य भूमिधरी और भूमि संबंधी मामलों की प्रक्रिया को सरल बनाना है।
सिर्फ जमीन का मालिकाना नहीं, आर्थिक गतिविधियों पर भी असर
भूमिधरी अधिकार का महत्व केवल राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होने तक सीमित नहीं है। भूमि अधिकार स्पष्ट होने से संबंधित परिवारों की संपत्ति की कानूनी स्थिति मजबूत हो सकती है और भविष्य में भूमि के उपयोग, हस्तांतरण अथवा अन्य वैध आर्थिक गतिविधियों से जुड़े मामलों में स्पष्टता बढ़ सकती है।हालांकि, हर पट्टेदार या कब्जाधारी स्वतः भूमिधर नहीं हो जाएगा। पात्रता, भूमि की श्रेणी, रिकॉर्ड, पूर्व पट्टा, कब्जे की स्थिति और सरकार द्वारा निर्धारित अन्य शर्तों के आधार पर ही अधिकार दिए जाएंगे। इसलिए कैबिनेट की मंजूरी को सीधे सभी मामलों में मालिकाना हक मिलने के रूप में देखना सही नहीं होगा।
पहली बार देहरादून से बाहर सीमांत क्षेत्र में कैबिनेट बैठक आयोजित करते हुए सरकार ने 24 प्रस्तावों को मंजूरी दी। भूमि अधिकार के फैसले ने हालांकि सबसे अधिक ध्यान खींचा है, क्योंकि इसका सीधा संबंध लंबे समय से पट्टे अथवा कब्जे के आधार पर रह रहे परिवारों से है। अब असली परीक्षा सरकार द्वारा पात्रता की स्पष्टता, आवेदन प्रक्रिया की सरलता और राजस्व स्तर पर तेजी से मामलों के निस्तारण की होगी।
